प्रश्न
बैंक में रखा पैसा ख़र्च हो जाता है, इसलिए मैं उसे प्लॉटों में लगा देता हूँ — बेचने की कोई जल्दी नहीं; ज़रूरत पड़ने पर या दाम बढ़ने पर शायद बेच दूँ। क्या इस पर हर साल ज़कात वाजिब है?
निर्णय (फतवा)
मुख़्तसर जवाब: पक्की और साफ़ तिजारती नीयत के बग़ैर (यानी प्लॉट ख़रीदा ही मुनाफ़े पर दोबारा बेचने के लिए हो) प्लॉट पर सालाना ज़कात नहीं — 'ज़रूरत पड़ी तो शायद बेच दूँ' जैसे लटके हुए ख़याल उसे माल-ए-तिजारत नहीं बनाते। जब आप वाक़ई बेच दें तो रक़म आपके नक़द हिसाब में शामिल हो जाएगी: उसी दिन से हौल शुरू होगा और साल पूरा होने पर ज़कात वाजिब होगी। लेकिन जिस दिन आप पक्का इरादा कर लें कि 'यह मैं मुनाफ़े पर बेचूँगा', उसी दिन से वह माल-ए-तिजारत बन जाता है और उस पर हर साल ज़कात वाजिब होती है।
तफ़सील: यह 'ग़ैर-मुतअय्यन नीयत' वाले फ़तवे ही का इतलाक़ है — ज़मीन का असल हुक्म यह है कि उस पर ज़कात नहीं; सिर्फ़ पक्की तिजारती नीयत इससे मुस्तसना है। दो तंबीहें: (1) ज़कात से बचने की चाल के तौर पर नक़दी को ज़मीन में बदलना गुनाह है — ऐसे हीले हराम हैं; (2) साल-दर-साल माल को बेकार पड़ा रहने देना उम्मत के लिए नुक़सानदेह है — उसे खेती, किराए या सरमायाकारी में लगाना बेहतर है। शक की सूरत में एहतियात का रास्ता यह है कि बिक्री के साल पूरी क़ीमत पर एक साल की ज़कात अदा कर दी जाए।
दलाइल: सहीह बुख़ारी 1 और सहीह मुस्लिम 1907 (नीयतें); सहीह बुख़ारी 1464 का उसूल-ए-इस्तिसना (छूट का उसूल); सहीह बुख़ारी 1450 का हीलों की मुमानअत का उसूल; शैख़ इब्न उसैमीन (मजमू' फ़तावा, ज़कात)।
पेचीदा इन्फ़िरादी सूरतों में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
संदर्भ
Quran
Quran 9:103
Hadith
Bukhari 1, 1450, 1464
Fiqh
al-Uthaymin on land held as store of value