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Real Estate जुल 13, 2026

औलाद को जायदाद का हिबा: इंसाफ़ और ज़कात

प्रश्न

मैं अपनी ज़िंदगी में औलाद के दरमियान ज़मीन और फ़्लैट तक़सीम करना चाहता हूँ। शरीयत में इसके क्या अहकाम हैं, और हिबा के बाद ज़कात किसके ज़िम्मे होगी?

निर्णय (फतवा)

मुख़्तसर जवाब: (1) ज़िंदगी में औलाद को हिबा करना जायज़ है — लेकिन बेटों और बेटियों के दरमियान इंसाफ़ (बराबरी) वाजिब है: नबी करीम ﷺ ने एक औलाद को ख़ास अतिया देने पर गवाह बनने से इनकार फ़रमाया और उसे ज़ुल्म क़रार दिया। (2) हिबा क़ब्ज़े की मुंतक़िली से मुकम्मल होता है; उसके बाद जायदाद औलाद की मिल्कियत है — अगर उसके ज़ाती इस्तेमाल में हो तो ज़कात नहीं, किराए पर दी हो तो किराए की आमदनी पर उसकी ज़कात है, और नाबालिग़ की तरफ़ से उसका वली ख़ुद नाबालिग़ के माल से ज़कात अदा करेगा। (3) सिर्फ़ काग़ज़ी हिबा जबकि क़ब्ज़ा और फ़ायदा बाप ही के पास रहे, सिरे से हिबा ही नहीं — माल बाप ही के हिसाब में रहेगा, और अगर मक़सद वारिसों को महरूम करना हो तो गुनाह भी है। तफ़सील: इंसाफ़ के मेयार के बारे में: जमहूर के नज़दीक बेटों और बेटियों को बराबर देना ही सुन्नत के मुताबिक़ एहतियात का रास्ता है; कुछ अहल-ए-इल्म ने मीरास के तनासुब का क़ौल किया है — बराबरी सबसे महफ़ूज़ है, और किसी ज़रूरतमंद औलाद (बीमार, तंगदस्त) को ज़्यादा देना हो तो बेहतर है कि दूसरों की रज़ामंदी से हो। मर्ज़-ए-वफ़ात का 'हिबा' दरहक़ीक़त वसीयत के हुक्म में है — और वारिस के लिए कोई वसीयत नहीं। ज़कात के क़ाबिल नक़दी/सोना हिबा किया जाए तो पाने वाले के हाथ में नया हौल शुरू होता है। दलील: सहीह बुख़ारी 2587 और सहीह मुस्लिम 1623 (नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हुमा); क़ुरआन 4:11; और मिल्कियत व ज़ाती इस्तेमाल के माल के उसूल — सहीह बुख़ारी 1464। पेचीदा इनफ़िरादी सूरतों में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।

संदर्भ

Quran Quran 4:11
Hadith Bukhari 2587; Muslim 1623
Fiqh majority on equality in gifts to children
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