प्रश्न
क्या ज़कात से अस्पताल बनाना, कुआँ खोदना, या बाढ़ और आपदा राहत में देना जायज़ है?
निर्णय (फतवा)
संक्षिप्त उत्तर: नहीं, सीधे तौर पर अस्पताल बनाने, कुआँ खोदने या आम आपदा राहत परियोजनाओं में ज़कात देना जायज़ नहीं है, क्योंकि ज़कात को सूरह अत-तौबा 9:60 में बताए गए आठ मदों तक सीमित रखना ज़रूरी है और किसी फ़र्द मुस्तहिक़ को मालिक बनाना (तमलीक) शर्त है। हालाँकि, अगर ज़कात किसी मुक़र्रर फ़क़ीर या मिस्कीन को दी जाए और वह उसे इलाज, पानी या आपदा की ज़रूरत में इस्तेमाल करे, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से जायज़ हो सकती है।
तफ़्सील: सूरह अत-तौबा 9:60 में बताए गए आठ मद ये हैं: फ़क़ीर (फ़ुक़रा), मिस्कीन (मसाकीन), ज़कात वसूल करने वाले, तालीफ़-ए-क़ल्ब वाले, ग़ुलामों की आज़ादी, क़र्ज़दार, अल्लाह की राह में (फ़ी सबीलिल्लाह) और मुसाफ़िर। दलील के लिहाज़ से राजेह क़ौल, जो स्थायी समिति (लजना दाइमा) और शैख़ इब्न बाज़ का है, यह है कि 'फ़ी सबीलिल्लाह' का मुख्य अर्थ जिहाद और उसकी तैयारी है, न कि आम जनकल्याण। इसलिए अस्पताल बनाना, कुँए खोदना या आपदा राहत को एक परियोजना के तौर पर फ़ंड करना किसी मद में शामिल नहीं होता और इसमें किसी फ़र्द को तमलीक नहीं होती। हदीसें (जैसे सहीह बुख़ारी 1454, 1455; सहीह मुस्लिम 987a) ज़कात को उसके सही मुस्तहिक़ीन तक ठीक तरह से पहुँचाने पर ज़ोर देती हैं। एक अल्पमत राय 'फ़ी सबीलिल्लाह' को तमाम नेकियों तक फैलाती है, मगर वह कमज़ोर समझी जाती है।
दलाइल:
1. सूरह अत-तौबा 9:60 साफ़ तौर पर ज़कात को आठ मदों तक सीमित करती है। (P1)
2. स्थायी समिति: अस्पतालों, कुँओं, सड़कों या आम जनकल्याण परियोजनाओं में सीधे ज़कात देना सही नहीं है, क्योंकि ज़कात आठ मदों तक सीमित है और तमलीक शर्त है। (P2)
3. स्थायी समिति और इब्न बाज़: 'फ़ी सबीलिल्लाह' का मतलब जिहाद और उसकी तैयारी है, न कि आम जनकल्याण। (P3)
सूचना: यह फ़तवा दिए गए दलाइल पर आधारित है। पेचीदा या व्यक्तिगत मामलों में किसी इल्म वाले आलिम से सलाह लें।
संदर्भ
Quran
Surah At-Tawbah 9:60
Fiqh
Permanent Committee (al-Lajnah al-Da'imah); Ibn Baz; al-Uthaymin