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Real Estate जुल 13, 2026

गिरवी रखी ज़मीन और भोग-बंधक का हुक्म

प्रश्न

क़र्ज़ की ज़मानत में ज़मीन गिरवी रखी गई है — देहात में रायज 'भोग-बंधक' में क़र्ज़ देने वाला ज़मीन पर खेती करके पैदावार खुद ले लेता है। इन सूरतों के अहकाम और ज़कात क्या हैं?

निर्णय (फतवा)

मुख़्तसर जवाब: (1) गिरवी रखी ज़मीन बदस्तूर मालिक ही की रहती है — ज़ाती/ज़रई ज़मीन पर मामूल के अहकाम बाक़ी रहते हैं (क़ीमत पर ज़कात नहीं; फ़सल पर उश्र), और तिजारती माल वाली ज़मीन गिरवी होने के बावजूद बाज़ारी क़ीमत पर ज़कात के ताबे रहती है। (2) 'भोग-बंधक' — क़र्ज़ के बदले क़र्ज़ देने वाले का ज़मीन की पैदावार से फ़ायदा उठाना — दलील पर चलने वाले उलमा के नज़दीक सूद में दाख़िल है: क़र्ज़ से खींचा गया हर मशरूत फ़ायदा सूद की असल हक़ीक़त है। इस मुआहदे से निकलकर जायज़ मुतबादिल इख़्तियार करना वाजिब है (बाज़ारी किराए पर अलग इजारा, या ज़मीन का कुछ हिस्सा बेच देना)। तफ़सील: रहन (गिरवी रखना) बज़ाते-ख़ुद जायज़ है — क़ुरआन ने क़ब्ज़े में लिए गए रहन की तसदीक़ की है; नाजायज़ यह है कि क़र्ज़ देने वाला गिरवी माल की पैदावार खाए, क्योंकि यह क़र्ज़ पर नफ़ा है। भोग-बंधक में फ़सल का उश्र उसी के ज़िम्मे है जो खेती करता और पैदावार का मालिक बनता है; लेकिन उश्र अदा करने से नाजायज़ मुआहदा पाक नहीं हो जाता — उसकी इस्लाह ज़रूरी है। दलाइल: क़ुरआन 2:283 (रहन की मशरूइयत); क़ुरआन 2:275; सहीह बुख़ारी 2068 (नबी ﷺ ने अपनी ज़िरह जौ के बदले गिरवी रखी — गिरवी जायज़, मगर क़र्ज़ देने वाले के इज़ाफ़ी फ़ायदे की कोई इजाज़त नहीं); अल-लजना अद-दाइमा और शैख़ इब्ने बाज़ का फ़तवा कि क़र्ज़ के बदले गिरवी ज़मीन की पैदावार खाना सूद है। पेचीदा इनफ़िरादी सूरतों में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।

संदर्भ

Quran Quran 2:283, 2:275
Hadith Sahih al-Bukhari 2068
Fiqh Permanent Committee; Ibn Baz on pledge yield
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