प्रश्न
एक रिश्तेदार एनजीओ/बैंक के सूदी क़र्ज़ों के जाल में फँस गया है — क़िस्त पर क़िस्त बढ़ती जा रही है। क्या उसे ज़कात की रक़म दी जा सकती है?
निर्णय (फतवा)
मुख़्तसर जवाब: जी हाँ — तंगदस्त क़र्ज़दार (ग़ारिम) ज़कात की क़ुरआन में मुक़र्रर की हुई मद है; अगरचे क़र्ज़ सूदी मुआहदे पर हो, जो शख़्स वाक़ई अदायगी से आजिज़ हो और सच्चे दिल से इस जाल से निकलना चाहता हो, उसे असल क़र्ज़ और चढ़े हुए बोझ की अदायगी के बक़दर ज़कात दी जा सकती है — बेहतर यह है कि रक़म सीधे क़र्ज़ख़्वाह को अदा की जाए ताकि पैसा कहीं और ख़र्च न हो। शर्त: वह सूदी क़र्ज़ लेने से तौबा करे; जारी आदत की माली मदद गुनाह में ताअवुन बन जाती है।
तफ़सील: देहाती हक़ीक़त में बहुत से लोग मजबूरी के आलम में सूदी क़िस्तों में फँस जाते हैं — उनके लिए ज़कात ही शरीअत का हिफ़ाज़ती हिसार है: अल्लाह ने मालदारों के माल में उनका हक़ मुक़र्रर फ़रमाया है। तरजीह दें: (1) असल क़र्ज़ की अदायगी, (2) घरवालों का खाना और लिबास; हलाल मुतबादिल (क़र्ज़े-हसना फ़ंड, तआवुनी इदारे) खड़े करने में मदद सदक़ा-ए-जारिया है। ऐशो-इशरत या जुए और नशे के क़र्ज़ों में — पहले साबितशुदा तौबा, फिर मदद।
दलाइल: क़ुरआन 9:60; सहीह मुस्लिम 1044 (हदीस-ए-क़बीसा); क़ुरआन 5:2; शैख़ इब्न बाज़: सूदी उलझन से निकालने में मदद जाइज़ है, आइंदा सूद पर इआनत नहीं।
पेचीदा इनफ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजूअ करें।
संदर्भ
Quran
Quran 9:60; 5:2
Hadith
Sahih Muslim 1044
Fiqh
Ibn Baz on aiding the indebted