प्रश्न
मेरी रिटायरमेंट की रक़म बैंक के फ़िक्स्ड डिपॉज़िट (FDR) में रखी है। क्या हर साल पूरी FDR की ज़कात अदा करूँ? और 'मुनाफ़े' का क्या हुक्म है?
निर्णय (फतवा)
मुख़्तसर जवाब: (1) जी हाँ — FDR की असल रक़म आपका माल है; उसे मियाद से पहले भी (जुर्माना देकर) तुड़वाया जा सकता है, इसलिए मिल्कियत और इख़्तियार मुकम्मल हैं — हर साल उसे अपनी बाक़ी नक़दी के साथ मिलाकर 2.5% ज़कात अदा करें। (2) रिवायती बैंक का मुक़र्रर दर वाला मुनाफ़ा सूद (रिबा) है — उसे लेना जायज़ नहीं; जो जमा हो चुका हो उसे सवाब की नीयत के बग़ैर सदक़ा करके उससे नजात हासिल करें; वह ज़कात नहीं है और न ही आपकी ज़कात में शुमार हो सकता है।
तफ़सील: यह अंदेशा कि 'ज़कात देते-देते बचत ख़त्म हो जाएगी' — इसका जवाब: ज़कात बढ़ने वाले माल का हक़ है — माल को बेकार न छोड़ें, बल्कि हलाल तिजारत/सरमायाकारी में लगाएँ, जैसा कि उमर (रज़ि.) ने यतीमों के माल के बारे में भी यही हिदायत दी। इस्लामी बैंक के मुज़ारबा डिपॉज़िट ढाँचे के लिहाज़ से मुख़्तलिफ़ हैं (नफ़ा-नुक़सान में शिरकत) और हक़ीक़ी शरई पाबंदी की तसदीक़ की शर्त पर मुतबादिल हो सकते हैं; उनसे हासिल हलाल मुनाफ़ा भी अगर जमा रहे तो उस पर ज़कात वाजिब है।
दलील: क़ुरआन 2:275; सहीह मुस्लिम 1598; क़ुरआन 9:34-35 और सहीह मुस्लिम 987 (ज़कात अदा न किए गए ख़ज़ानों पर वईद); बैंक के सूद से नजात के तरीक़े पर लजना दाइमा और शैख़ इब्ने बाज़ के फ़तावा।
पेचीदा इनफ़िरादी मसलों में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
संदर्भ
Quran
Quran 2:275; 9:34-35
Hadith
Muslim 1598, 987
Fiqh
Permanent Committee; Ibn Baz