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Foundations & Conditions
Jul 13, 2026
ज़कात क्या है और इस्लाम के रुक्न के रूप में इसका मक़ाम
Question
ज़कात क्या है, यह इस्लाम का रुक्न क्यों है, और दीन में इसका क्या मक़ाम है?
Ruling (Fatwa)
संक्षिप्त जवाब: ज़कात इस्लाम में एक फ़र्ज़ इबादत है, जो साहिब-ए-निसाब मुसलमानों पर लाज़िम करती है कि वे हर साल अपने माल का एक मुक़र्रर हिस्सा हक़दार लोगों को अदा करें। यह इस्लाम के पाँच रुक्न में से एक है, जो इसके मरकज़ी किरदार और फ़र्ज़ियत को ज़ाहिर करता है।
तफ़्सील: ज़कात (फ़र्ज़ सदक़ा) एक माली फ़रीज़ा है जिसे अल्लाह ने क़ुरआन में फ़र्ज़ किया और नबी (ﷺ) ने उसकी तफ़्सील बयान फ़रमाई। सूरह अत-तौबा 9:71 (P2) में अल्लाह मोमिनों को हुक्म देता है कि “नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो”, इस तरह ज़कात को ईमान के साथ जोड़ देता है। नबी (ﷺ) ने ज़कात की अदायगी को जन्नत में दाख़िले का एक अहम अमल क़रार दिया (सहीह बुख़ारी 1396, P5)। ज़कात के तफ़्सीली अहकाम—माल की क़िस्में, निसाब की मिक़दार, और हक़दार लोग—नबी (ﷺ) ने मुक़र्रर फ़रमाए, जैसा कि सहीह बुख़ारी 1454 (P1) में मज़कूर है। ज़कात माल को पाक करती है, सामाजिक यकजहती पैदा करती है, और अल्लाह की इताअत का एक मज़हर है। इसमें कोताही करना बड़ा गुनाह है, और यह सच्चे मोमिन और मुनाफ़िक़ के दरमियान फ़र्क़ करती है। रुक्न की हैसियत से इसका मक़ाम सरीह नुसूस की बुनियाद पर उम्मत के इज्माअ से साबित है।
दलाइल:
1. क़ुरआन 9:71: “और वे नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात अदा करते हैं…” (P2)
2. सहीह बुख़ारी 1396: नबी (ﷺ) ने जन्नत के तलबगार एक शख़्स से फ़रमाया: “तुम अल्लाह की इबादत करो… ज़कात अदा करो…” (P5)
3. सहीह बुख़ारी 1454: नबी (ﷺ) ने ज़कात को फ़र्ज़ किया और उसके अहकाम की तफ़्सील बयान फ़रमाई। (P1)
ज़कात के हिसाब या तक़सीम से मुताल्लिक़ पेचीदा मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
References
Quran
Surah At-Tawbah 9:71
Hadith
Sahih al-Bukhari 1396; Sahih al-Bukhari 1454
Fiqh
Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee for Islamic Research and Ifta