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Payment & Distribution Jul 13, 2026

ज़कात की नीयत

Question

क्या ज़कात के लिए कोई ख़ास नीयत ज़रूरी है, और यह कब करनी चाहिए?

Ruling (Fatwa)

मुख़्तसर जवाब: पेश किए गए दलाइल में ज़कात के लिए किसी ख़ास ज़बानी या ज़ाहिरी नीयत की शर्त का साफ़ ज़िक्र नहीं है। लेकिन आम इस्लामी उसूलों की बुनियाद पर और इस वजह से कि ज़कात एक इबादत है, दिल की नीयत तमाम इबादात के लिए असलन ज़रूरी है, जिसमें ज़कात भी शामिल है। नीयत ज़कात अदा करते वक़्त या माल अलग करते वक़्त करनी चाहिए, अल्लाह के हुक्म की तामील के इरादे से। तफ़सील: पेश की गई अहादीस (सहीह बुख़ारी 1454, 1404, 1395, 1403, 1504, 1496; सहीह मुस्लिम 983) ज़कात की फ़र्ज़ियत, उसकी क़िस्मों और उसमें कोताही पर सख़्त वईद को साबित करती हैं। ये ज़ाहिर करती हैं कि ज़कात एक लाज़िमी इबादत है। हर इबादत के बारे में नबी ﷺ ने सिखाया कि आमाल का दारोमदार नीयतों पर है (जैसा कि मशहूर हदीस में है, अगरचे वह यहाँ पेश नहीं की गई)। इसीलिए जब कोई मुसलमान ज़कात देता है तो दिल में नीयत का होना ज़रूरी है ताकि यह महज़ सदक़े या टैक्स से अलग हो। नीयत को ज़बान से कहना ज़रूरी नहीं। यह अदायगी के वक़्त या जब माल ज़कात के लिए मुक़र्रर किया जाए, उस वक़्त करनी चाहिए। दलाइल: 1. सहीह बुख़ारी 1454 (और इसी तरह सहीह बुख़ारी 1451, 1468, 1450, 1455) ज़कात के फ़र्ज़ अहकाम को तफ़सील से बयान करती है, जो ज़ाहिर करती है कि यह एक दीनी फ़रीज़ा है, नफ़ली अतिया नहीं। 2. सहीह बुख़ारी 1404 ज़कात अदा किए बग़ैर माल जमा करने के ख़िलाफ़ क़ुरआनी आयत पेश करती है, उसकी फ़र्ज़ियत पर ज़ोर देती है। 3. सहीह बुख़ारी 1395 नबी ﷺ का मुआज़ (रज़ि अल्लाहु अन्हु) को यह सिखाना बयान करती है कि ज़कात मालदारों से लेकर ग़रीबों को दी जाती है, जो इसे एक मुनज़्ज़म फ़रीज़ा साबित करती है। 4. सहीह बुख़ारी 1403 ज़कात अदा न करने वालों के लिए सख़्त अज़ाब की वईद देती है, जो उसकी अहमियत को उजागर करती है। 5. सहीह बुख़ारी 1504 और 1496 और भी तसदीक़ करती हैं कि ज़कात मुसलमानों पर एक फ़र्ज़ ज़िम्मेदारी है। ये नुसूस मजमूई तौर पर साबित करती हैं कि ज़कात एक फ़र्ज़ इबादत है। तमाम इबादात की तरह, अदायगी के वक़्त दुरुस्त नीयत (निय्यह) ज़रूरी है ताकि अमल सिर्फ़ अल्लाह के लिए हो। नीयत के बग़ैर अदायगी बतौर ज़कात दुरुस्त न हो सकेगी। इख़्तितामी तंबीह: यह फ़तवा सिर्फ़ पेश किए गए दलाइल पर मबनी है। पेचीदा या इनफ़िरादी मामलात के लिए किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।

References

Hadith Sahih al-Bukhari 1454; Sahih al-Bukhari 1404; Sahih al-Bukhari 1395; Sahih al-Bukhari 1403; Sahih al-Bukhari 1504; Sahih al-Bukhari 1496
Fiqh General Ahle Hadith position based on the obligatory nature of zakat and the principle of intention in worship