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Pension & GPF Jul 13, 2026

हज के लिए जमा किए गए पैसों की ज़कात

Question

मैं कई सालों से हज की नीयत से पैसे जमा कर रहा हूँ। क्या इबादत के लिए रखी गई रक़म पर भी ज़कात वाजिब है?

Ruling (Fatwa)

मुख़्तसर जवाब: जी हाँ। मक़सद चाहे कितना ही अज़ीम हो — हज हो, क़ुरबानी हो, औलाद की शादी हो या घर की तामीर — जब तक रक़म आपकी मिल्कियत में है और निसाब व हौल पूरा करती है, उस पर ज़कात फ़र्ज़ रहती है। नीयत माल को हिसाब से बाहर नहीं करती; सिर्फ़ असल ख़र्च ही उसे हिसाब से निकालता है। तफ़सील: हज इस्तिताअत (सामर्थ्य) से फ़र्ज़ होता है — और यही बचत आपकी इस्तिताअत है; दोनों इबादतें एक-दूसरे की हरीफ़ नहीं। अगर ज़कात देने से हज का फ़ंड थोड़ी देर से पूरा हो तो कोई हर्ज नहीं — फ़र्ज़ अदा करने की बरकत रास्ता खोलती है: 'तुम जो कुछ ख़र्च करोगे, वह उसका बदला देगा' (क़ुरआन 34:39)। जो रक़म हज एजेंसी को आख़िरी अदायगी के तौर पर दी जा चुकी है वह अब आपकी मिल्कियत नहीं रही और उस पर ज़कात नहीं; सिर्फ़ वही रक़म शुमार होगी जो आपके हाथ या अकाउंट में बाक़ी है। दलाइल: क़ुरआन 9:103; इब्ने माजा 1792 (हौल); क़ुरआन 34:39; शैख़ इब्ने बाज़ और लजना दाइमा का फ़तवा कि हज/शादी/तामीर के लिए जमा रक़म पर निसाब और हौल पूरा होते ही ज़कात वाजिब हो जाती है। पेचीदा इन्फ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।

References

Quran Quran 9:103; 34:39
Hadith Ibn Majah 1792, sahih per al-Albani
Fiqh Ibn Baz; Permanent Committee on earmarked savings