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Zakat al-Fitr Jul 13, 2026

सदक़ा-ए-फ़ित्र: वुजूब और किन लोगों पर अदा करना लाज़िम है

Question

सदक़ा-ए-फ़ित्र किस पर अदा करना वाजिब है, और क्या घर का सरबराह अपने ज़ेर-ए-किफ़ालत लोगों की तरफ़ से अदा करेगा?

Ruling (Fatwa)

मुख़्तसर जवाब: सदक़ा-ए-फ़ित्र हर मुसलमान पर वाजिब है, चाहे मर्द हो या औरत, छोटा हो या बड़ा, आज़ाद हो या ग़ुलाम, जो अदा करने की इस्तिताअत रखता हो। घर का सरबराह अपने उन ज़ेर-ए-किफ़ालत लोगों की तरफ़ से अदा करने का ज़िम्मेदार है जिनके पास अपना माल नहीं (जैसे बच्चे, बूढ़े वालिदैन जिनका वह ख़र्च उठाता है, और ग़ुलाम)। जो ज़ेर-ए-किफ़ालत लोग अपना माल रखते हैं, उन्हें ख़ुद अदा करनी चाहिए, अलबत्ता सरपरस्त उनकी इजाज़त से अदा कर सकता है। तफ़्सील: वुजूब इन नुसूस से साबित है: नबी (ﷺ) ने इसे हर मुसलमान पर फ़र्ज़ किया, चाहे ग़ुलाम हो या आज़ाद, मर्द हो या औरत, छोटा हो या बड़ा (सहीह बुख़ारी 1503, 1504)। सहाबा किराम अपने हर छोटे बड़े, आज़ाद और ग़ुलाम की तरफ़ से अदा किया करते थे (सहीह मुस्लिम 985b)। यह इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि वुजूब ज़ाती है, लेकिन सरपरस्त अपने उन ज़ेर-ए-किफ़ालत लोगों की तरफ़ से इसे अदा करता है जो ख़ुद अदा नहीं कर सकते। इस बात की कोई ख़ास दलील नहीं कि घर के सरबराह पर उन बालिग़ ज़ेर-ए-किफ़ालत लोगों की तरफ़ से अदायगी लाज़िम है जिनकी अपनी आमदनी हो; उन्हें अपना सदक़ा-ए-फ़ित्र ख़ुद अदा करना होगा। दलाइल: 1. सहीह बुख़ारी 1504: ”अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने हर ग़ुलाम या आज़ाद मुसलमान पर, चाहे मर्द हो या औरत, सदक़ा-ए-फ़ित्र के तौर पर एक साअ खजूर या जौ अदा करना फ़र्ज़ किया।“ 2. सहीह बुख़ारी 1503: ”अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने हर मुसलमान ग़ुलाम या आज़ाद, मर्द या औरत, छोटे या बड़े पर सदक़ा-ए-फ़ित्र के तौर पर एक साअ खजूर या एक साअ जौ अदा करने का हुक्म दिया।“ 3. सहीह मुस्लिम 985b: ”हम रसूलुल्लाह (ﷺ) के ज़माने में अपने हर छोटे बड़े, आज़ाद मर्द या ग़ुलाम की तरफ़ से सदक़ा-ए-फ़ित्र के तौर पर एक साअ ग़ल्ला निकाला करते थे।“ ये नुसूस वाज़ेह करती हैं कि सदक़ा-ए-फ़ित्र तमाम मुसलमानों पर वाजिब है, और सहाबा का अमल ज़ाहिर करता है कि घर का सरबराह अपने ज़ेर-ए-किफ़ालत लोगों की तरफ़ से अदा करता है। पेचीदा मसाइल में किसी साहिब-ए-इल्म आलिम से रुजूअ करें।

References

Hadith Sahih Muslim 985b; Sahih al-Bukhari 1504; Sahih al-Bukhari 1503
Fiqh Based on Sahih al-Bukhari (1503, 1504) and Sahih Muslim (985b); the practice of the Companions; evidence-based position of Ibn Baz, al-Uthaymin, and the Permanent Committee.