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Recipients (8 Categories) Jul 13, 2026

ज़कात को दूसरे शहर या देश में भेजना

Question

क्या मैं अपनी ज़कात मक़ामी तौर पर देने के बजाय किसी दूसरे शहर या देश में ग़रीब रिश्तेदारों या नेक कामों के लिए भेज सकता हूँ?

Ruling (Fatwa)

मुख़्तसर जवाब: असल हुक्म यह है कि ज़कात उसी इलाक़े के फ़ुक़रा (ग़रीबों) में तक़सीम की जाए जहाँ माल मौजूद है, जैसा कि नबी ﷺ ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को (यमन भेजते वक़्त) हुक्म दिया (सहीह बुख़ारी 1496, 1458, 1395)। लेकिन किसी जायज़ ज़रूरत के वक़्त ज़कात को दूसरे शहर या देश मुंतक़िल करना जायज़ है—जैसे किसी दूसरी जगह ग़रीब रिश्तेदारों की मदद करना, जब मक़ामी तौर पर कोई मुस्तहिक़ ग़रीब न हो, या जब कहीं और ज़्यादा ज़रूरत या क़हत (अकाल) हो। ऐसे मोहताज रिश्तेदारों को ज़कात देना जिनका नफ़क़ा (ख़र्च) आप पर वाजिब नहीं (जैसे भाई, बहन, चचा, भतीजा) न सिर्फ़ जायज़ है बल्कि इसमें दोहरा अज्र (सवाब) है (सहीह बुख़ारी 1466, जैसा कि P9 में मज़कूर है)। मुस्तक़िल कमेटी भी इस उसूल की तस्दीक़ करती है: अगर शदीद ज़रूरत हो तो मुंतक़िली जायज़ है। याद रहे कि ज़कात का मुस्तहिक़ या उसके मुक़र्रर किए गए वकील तक पहुँचना ज़रूरी है; सिर्फ़ भेज देना ज़िम्मेदारी से बरी नहीं करता (P4)। दलाइल: 1. नबी ﷺ ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को यमन में हुक्म दिया: ”इसे उनके मालदारों से लो और उनके फ़ुक़रा को दो“ (सहीह बुख़ारी 1496; और सहीह बुख़ारी 1458, 1395)। यह मक़ामी फ़ुक़रा को तरजीह देने का उसूल क़ायम करता है। 2. मुस्तक़िल कमेटी (अल-लजना अद-दाइमा) फ़रमाती है: असल यह है कि इलाक़े के फ़ुक़रा को दिया जाए, लेकिन हक़ीक़ी ज़रूरत की सूरत में मुंतक़िली जायज़ है, जैसे किसी और जगह ग़रीब रिश्तेदार हों, मक़ामी तौर पर कोई ग़रीब न हो, या ज़्यादा ज़रूरत हो (फ़तावा अल-लजना अद-दाइमा, P2)। 3. ऐसे मोहताज रिश्तेदारों को ज़कात देना जिनका नफ़क़ा आप पर वाजिब नहीं, अफ़ज़ल है, क्योंकि इसमें सदक़ा और सिला-रहमी (रिश्तेदारी निभाना) दोनों जमा हो जाते हैं (मुस्तक़िल कमेटी और शैख़ अल-उसैमीन, P9)। तंबीह: यह फ़तवा फ़राहम कर्दा दलाइल पर मबनी है। बड़ी रक़म या कई फ़रीक़ों से मुताल्लिक़ पेचीदा मामलात में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।

References

Hadith Sahih al-Bukhari 1496; Sahih al-Bukhari 1458; Sahih al-Bukhari 1395
Fiqh Permanent Committee for Scholarly Research and Ifta; based on Sahih al-Bukhari 1496, 1458, 1395; Sahih Muslim 983 (indirectly).