Question
मैंने एक रिश्तेदार को बड़ी रक़म क़र्ज़ दी है; वह खुशहाल है, क़र्ज़ का इक़रार भी करता है और वक़्त पर अदा कर देगा। क्या मुझ पर इस रक़म की ज़कात वाजिब है?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: जी हाँ। खुशहाल और इक़रार करने वाले क़र्ज़दार के ज़िम्मे आपका क़र्ज़ 'मज़बूत क़र्ज़' (दैन-ए-क़वी) है — यह आपका ही माल है, बस दूसरे के हाथ में है। हर साल अपने ज़कात के दिन उसे अपने बाक़ी माल के साथ मिलाकर 2.5% अदा करें। अगर अभी अदा करना मुश्किल हो तो वसूली तक टालकर तमाम जमा हुए सालों की ज़कात एक साथ अदा करने की भी गुंजाइश है — वाजिब बहरहाल आपके ज़िम्मे बाक़ी रहेगा।
तफ़सील: उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु ज़कात के महीने में एलान फ़रमाते: अपने क़र्ज़े (वसूल होने वाली रक़में) अपने माल के साथ गिनकर ज़कात अदा करो — मौजूद सहाबा में से किसी ने इस पर एतराज़ नहीं किया। बुनियाद यह है कि वसूल होने वाला क़र्ज़ अमलन हाथ में मौजूद नक़दी के हुक्म में है। जबकि तंगदस्त या इनकार करने वाले के ज़िम्मे क़र्ज़ 'कमज़ोर क़र्ज़' (दैन-ए-ज़ईफ़) है, जिसका हुक्म अलग है (अगला फ़तवा देखें)।
दलाइल: क़ुरआन 9:103; सहीह बुख़ारी 1454 (नक़दी पर 2.5%); उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु का असर (मुवत्ता मालिक, किताबुज़-ज़कात); शैख़ इब्न बाज़ और अल-लजना अद-दाइमा (स्थायी फ़तवा कमेटी) का फ़तवा कि मज़बूत क़र्ज़ की ज़कात हर साल वाजिब है।
पेचीदा इनफ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
References
Quran
Quran 9:103
Hadith
Bukhari 1454; athar of Uthman, Muwatta
Fiqh
Ibn Baz; Permanent Committee on strong debts