Question
मैंने ज़मीन ख़रीदी है मगर अभी तय नहीं किया कि क्या करूँगा — अच्छी क़ीमत मिले तो बेच भी सकता हूँ और मकान भी बना सकता हूँ। क्या इस हालत में ज़कात वाजिब है?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: नहीं। माल-ए-तिजारत की ज़कात के लिए तिजारत की पक्की और साफ़ नीयत शर्त है। 'बेच भी सकता हूँ, रख भी सकता हूँ' — इस दुविधा की हालत में ज़मीन आम मिल्कियत के असल हुक्म पर रहती है, जिस पर कोई ज़कात नहीं। जिस दिन आप पक्के इरादे से उसकी तिजारत की नीयत कर लें, उसी दिन से वह माल-ए-तिजारत बन जाती है और उसी वक़्त से उसका हौल शुरू होता है।
तफ़सील: ज़मीन और मकानों में असल यही है कि उन पर ज़कात नहीं (ज़ाती माल); माल-ए-तिजारत बनना इस्तिसना है जो सिर्फ़ नीयत से साबित होता है। शक की सूरत में असल हुक्म बरक़रार रहता है। जमहूर उलमा के नज़दीक तिजारत की नीयत ख़रीदारी के वक़्त मौजूद होनी चाहिए या बाद में पक्के तौर पर बाँधी जाए; महज़ इम्कान काफ़ी नहीं। शैख़ इब्न उसैमीन ने यह उसूल साफ़ बयान किया है: 'शायद बेच दूँ' जैसे डाँवाँडोल ख़यालात से माल-ए-तिजारत की ज़कात साबित नहीं होती।
दलाइल: क़ुरआन 2:286 (अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता — साबित सबब के बग़ैर कोई ज़िम्मेदारी आयद नहीं होती); सहीह बुख़ारी 1 और सहीह मुस्लिम 1907 (आमाल का दारोमदार नीयतों पर है); सहीह बुख़ारी 1464 (ज़ाती माल के ज़कात से मुस्तसना होने का असूल); शैख़ इब्न उसैमीन (मजमू' फ़तावा व रसाइल, ज़कात) — पक्की नीयत की शर्त पर।
पेचीदा इन्फ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
References
Quran
Quran 2:286
Hadith
Bukhari 1, 1464; Muslim 1907
Fiqh
al-Uthaymin on firm trade intention