Question
मैं अपने बच्चे के मुस्तक़बिल के लिए उसके नाम पर सरमायाकारी करता हूँ — हक़ीक़त में वह मैंने उसे हिबा कर दिया है। क्या नाबालिग़ के माल पर ज़कात है, और उसे कौन अदा करेगा?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: जी हाँ — जम्हूर उलमा (इमाम मालिक, शाफ़िई, अहमद; और यही शैख़ इब्न बाज़ और शैख़ उसैमीन का फ़तवा है) के नज़दीक नाबालिग़ और मजनून (पागल) के माल पर भी ज़कात फ़र्ज़ है, क्योंकि ज़कात माल ही से मुताल्लिक़ हक़ है — मालिक का मुकल्लफ़ होना शर्त नहीं। वली (सरपरस्त) बच्चे के अपने माल ही से इसे अदा करेगा और हिसाब रखेगा।
तफ़सील: हज़रत उमर (रज़ि.) फ़रमाते थे: 'यतीमों के माल में तिजारत करो ताकि सदक़ा (ज़कात) उसे खा न जाए', और हज़रत आइशा (रज़ि.) अपनी ज़ेर-ए-कफ़ालत यतीमों के माल की ज़कात अदा करती थीं — सहाबा-ए-किराम जानते थे कि नाबालिग़ के माल पर ज़कात वाजिब है। आम शराइत बच्चे के अपने माल पर लागू होंगी (बशर्ते कि हिबा हक़ीक़ी हो): उसका माल ख़ुद-ब-ख़ुद निसाब को पहुँचे और उस पर साल (हौल) गुज़रे — वालिद के माल के साथ मिलाकर नहीं, बल्कि अलग हिसाब से। और जो रक़म महज़ दिखावे के लिए बच्चे के नाम रखी गई हो जबकि हक़ीक़त में वह आप ही की हो, वह आप ही का माल है — आप अपने हिसाब में उसकी ज़कात देंगे।
दलाइल: क़ुरआन 9:103 (उमूमी तौर पर); सहीह बुख़ारी 1395 (उनके मालदारों से ली जाएगी — और मालदार नाबालिग़ भी मालदार है); हज़रत उमर (रज़ि.) का मशहूर असर (मुवत्ता) और हज़रत आइशा (रज़ि.) का अमल।
पेचीदा इन्फ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
References
Quran
Quran 9:103
Hadith
Bukhari 1395; athar of Umar, Muwatta
Fiqh
majority; Ibn Baz; al-Uthaymin