Question
मेरे माल की क़ीमत अदा हो चुकी है लेकिन मेरी ज़कात की तारीख़ पर वह अभी जहाज़ में या कस्टम में है — क्या उस पर ज़कात वाजिब है?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: जी हाँ, जो माल मिल्कियत में हो और तिजारत की नीयत से रखा गया हो, वह मालِ तिजारत के तौर पर ज़कात के क़ाबिल है, चाहे वह रास्ते में हो या कस्टम में रुका हुआ हो, बशर्ते उसकी क़ीमत (दूसरे ज़कात वाले माल के साथ) निसाब तक पहुँच जाए और उस पर पूरा क़मरी साल गुज़र जाए। राजेह क़ौल यह है कि मालِ तिजारत में ज़कात के वुजूब का मदार मिल्कियत पर है, जिस्मानी क़ब्ज़े पर नहीं। कुछ उलमा ने मशवरा दिया है कि अगर माल की क़ीमत में ग़ैर-यक़ीनी हो या नुक़सान का ख़तरा हो तो माल हाथ आने तक इंतज़ार कर लिया जाए, लेकिन ज़्यादा मज़बूत राय यह है कि ज़कात उसी तारीख़ पर वाजिब होती है जब वह वाजिब हो, मौजूदा बाज़ारी क़ीमत के मुताबिक़।
दलाइल:
1. सहीह बुख़ारी 1454 हर मुसलमान के माल पर ज़कात के आम वुजूब को साबित करती है। इसमें हर मिल्कियती माल शामिल है, तिजारती सामान समेत।
2. सहीह बुख़ारी 1402 और 1404 ज़कात अदा किए बग़ैर माल जमा करने से ख़बरदार करती हैं, और इनमें ऊँट, सोना, चाँदी और बिल-क़ियास हर तिजारती माल शामिल है।
3. सहीह मुस्लिम 987a इसी तरह सोने और चाँदी की ज़कात अदा करने की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर देती है, जो इस बात को तक़वियत देती है कि ज़कात उन मालों पर वाजिब है जो मिल्कियत में हों और मुस्तसना न हों।
चूँकि मज़कूरा अहादीस ख़ास तौर पर रास्ते में मौजूद माल के बारे में बात नहीं करतीं, इसलिए हम इस आम उसूल पर एतमाद करते हैं कि ज़कात मिल्कियती माल पर वाजिब है। लिहाज़ा अगर आपके माल की क़ीमत अदा हो चुकी है और आप उसके शरई मालिक हैं, तो वह आपके ज़कात वाले माल का हिस्सा है। पेचीदा सूरतों में (मसलन नुक़सान का ज़्यादा ख़तरा या क़ीमत लगाने में देरी) किसी अहल आलिम से रुजूअ करें।
तंबीह: यह फ़तवा सिर्फ़ पेश किए गए दलाइल पर मबनी है; अपनी सूरतेहाल पर तफ़सीली इतलाक़ के लिए किसी क़ाबिल-ए-एतमाद आलिम से रुजूअ करें।
References
Hadith
Sahih al-Bukhari 1454; Sahih al-Bukhari 1402; Sahih al-Bukhari 1404; Sahih Muslim 987a
Fiqh
Based on the general principles from Sahih al-Bukhari (1454, 1402, 1404) and Sahih Muslim (987a); no specific scholar cited in provided evidence.