Question
मेरे रेस्टोरेंट में जल्दी ख़राब होने वाली सामग्री और सामान मौजूद हैं — इन पर ज़कात का हिसाब कैसे करूँ?
Ruling (Fatwa)
संक्षिप्त उत्तर: जी हाँ, क़मरी (चांद) साल के अंत में बिक्री की नीयत से रखे गए जल्दी ख़राब होने वाले स्टॉक (माले-तिजारत) की बाज़ार क़ीमत पर ज़कात वाजिब है, बशर्ते वह निसाब (कम से कम मात्रा) तक पहुँच जाए। चीज़ों का जल्दी ख़राब होने वाला होना उन्हें ज़कात से मुस्तसना (छूट प्राप्त) नहीं करता, बशर्ते ज़कात वाजिब होने के वक़्त वे स्टॉक में मौजूद हों। सुन्नत के दलाइल से साबित होता है कि तिजारत की नीयत से रखे गए हर क़िस्म के माल पर ज़कात फ़र्ज़ है, और इसमें रेस्टोरेंट का स्टॉक भी शामिल है।
तफ़सील: रेस्टोरेंट में जल्दी ख़राब होने वाला स्टॉक — जैसे कच्ची सामग्री, सॉस (चटनियाँ) और दूसरा सामान — माले-तिजारत (उरूज़े-तिजारत) समझा जाता है, क्योंकि यह बिक्री की नीयत से ख़रीदा जाता है (चाहे सीधे या पका कर तैयार खाने की सूरत में)। ज़कात का हिसाब क़मरी साल के अंत में इनकी मौजूदा बाज़ार क़ीमत पर किया जाता है, ख़रीद क़ीमत या लागत पर नहीं। अगर स्टॉक साल के अंत से पहले पूरी तरह इस्तेमाल या बिक चुका हो तो उस पर ज़कात नहीं; सिर्फ़ वही गिना जाएगा जो साल के अंत में आपकी मिल्कियत में बाक़ी हो।
हदीसें माल की ज़कात के आम उसूल बताती हैं। मसलन, जब नबी ﷺ ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को यमन भेजा तो फ़रमाया: ”उन्हें बता दो कि अल्लाह ने उन पर सदक़ा (ज़कात) फ़र्ज़ किया है, जो उनके मालदारों से लिया जाएगा और उनके ग़रीबों को दिया जाएगा“ (सहीह बुख़ारी 1458)। यह हर क़िस्म के माल पर ज़कात की वसीअ फ़र्ज़ियत को साबित करता है, जो सिर्फ़ मवेशियों या पैदावार तक महदूद नहीं। इसी तरह सोने और चाँदी को जमा कर के रखने की मुमानियत (सहीह बुख़ारी 1404) इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि जो माल कारआमद इस्तेमाल में न लाया जाए — जैसे बेकार पड़ा स्टॉक — उस पर ज़कात वाजिब हो सकती है।
दलाइल:
1. सहीह बुख़ारी 1458: नबी ﷺ ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को हुक्म दिया कि लोगों को बताएँ कि अल्लाह ने उनके माल पर ज़कात फ़र्ज़ की है, जो यह ज़ाहिर करता है कि हर क़िस्म के माल पर ज़कात वाजिब है।
2. सहीह बुख़ारी 1404: इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने वज़ाहत की कि ज़कात अदा किए बग़ैर माल जमा करना क़ाबिले-मज़म्मत है, जो इस बात को तक़वियत देता है कि माले-तिजारत पर ज़कात वाजिब है।
3. सहीह बुख़ारी 1395: इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से इसी तरह की रिवायत जो नमाज़ के साथ ज़कात की फ़र्ज़ियत पर ज़ोर देती है।
ये नुसूस, अगरचे ख़ास तौर पर रेस्टोरेंट के स्टॉक के बारे में नहीं, एक आम उसूल क़ायम करती हैं कि हर वह माल जो बढ़ोतरी या तिजारत की नीयत से रखा जाए, उस पर ज़कात वाजिब है। अहले-हदीस उलमा, जैसे इब्ने बाज़ और अल-उसैमीन, ने इसे कारोबारी स्टॉक पर लागू किया है। जल्दी ख़राब होने वाली चीज़ों के मामले में, अगर वे साल के अंत में ग़ैर-फ़रोख़्त (बिना बिकी) रह जाएँ तो उनकी बाज़ार क़ीमत ज़कात के हिसाब में शामिल की जाएगी।
इख़्तितामी वज़ाहत: यह जवाब फ़राहम किए गए दलाइल की बुनियाद पर है। मिले-जुले (मख़लूत) स्टॉक, मुश्तरका मिल्कियत, या दुरुस्त क़ीमत तय करने के तरीक़ों पर मुश्तमिल पेचीदा मामलों के लिए, बराए-मेहरबानी किसी साहिबे-इल्म आलिम से रुजू करें।
References
Hadith
Sahih al-Bukhari 1458; Sahih al-Bukhari 1404; Sahih al-Bukhari 1395
Fiqh
Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee