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Payment & Distribution Jul 13, 2026

पिछले सालों की छूटी हुई ज़कात अदा करना

Question

मैंने कई पिछले सालों की ज़कात अदा नहीं की — मैं छूटे हुए सालों की ज़कात कैसे हिसाब करूँ और अदा करूँ?

Ruling (Fatwa)

संक्षिप्त जवाब: पेश किए गए दलील ज़कात के वुजूब और उसे छोड़ने पर सख़्त सज़ा को साबित करते हैं (सूरह अत-तौबा 9:34-35, सहीह मुस्लिम 987a), लेकिन इनमें यह साफ़ हिदायत नहीं कि पिछले सालों की ज़कात कैसे हिसाब या अदा की जाए। इसलिए नीचे दिया गया आम हुक्म दलीलों के कुल्ली उसूलों पर मबनी (आधारित) है। तफ़सील: ज़कात एक फ़र्ज़ इबादत है। अगर आपने पिछले सालों में यह अदा नहीं की तो आपको तौबा करनी चाहिए और जो वाजिब है उसे जल्द से जल्द अदा करना चाहिए। हिसाब के लिए आपको हर छूटे हुए साल के बारे में यह तय करना होगा: क्या आपका माल निसाब (कम से कम हद) तक पहुँचा था जैसा कि सहीह बुख़ारी 1454 और दूसरे दलील में बयान हुआ है (मसलन 5 औक़िया चाँदी, 5 वसक़ अनाज, 5 ऊँट – देखें P1, P10), वाजिब ज़कात की मिक़दार (आम तौर पर नक़दी/सोना/चाँदी पर 2.5%, मवेशियों वग़ैरा के लिए ख़ास दरें P1, P6, P7 के मुताबिक़), और हर साल के लिए अलग-अलग अदा करें। लेकिन कई छूटे हुए सालों के लिए दक़ीक़ (सटीक) फ़ॉर्मूले पेश किए गए मतन (ग्रंथों) में तफ़सील से मौजूद नहीं। उलमा सच्चे अंदाज़े की सिफ़ारिश करते हैं, और अगर सही आँकड़े मालूम न हों तो मुनासिब अंदाज़ा लगाकर अदा करें। माल जमा करने (कंज़) की हदीसें (P3, P8) इस बात पर ज़ोर देती हैं कि सज़ा से बचने के लिए ज़कात अदा करनी चाहिए। कुछ सहाबा का अदायगी से इनकार (P5, P9) ज़ाहिर करता है कि यह फ़रीज़ा संगीन है और इसे नाफ़िज़ करना ज़रूरी है। दलील: 1. सूरह अत-तौबा 9:34-35 (P8) उन लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब की चेतावनी देती है जो माल जमा करते हैं और उसकी ज़कात अदा नहीं करते। 2. सहीह मुस्लिम 987a (P2) बयान करती है कि क़यामत के दिन वह माल गरम किया जाएगा और उससे उस मालिक को दाग़ा जाएगा जिसने ज़कात अदा नहीं की। 3. सहीह बुख़ारी 1397 (P12) ज़कात को इस्लाम के अरकान (स्तंभों) में शुमार करती है। 4. सहीह बुख़ारी 1454 (P1) मुख़्तलिफ़ किस्म के माल के लिए तफ़सीली दरें और निसाब बयान करती है। 5. सहीह मुस्लिम 979a (P10) ज़कात के लिए कम से कम हदें मुक़र्रर करती है। तंबीह: यह फ़तवा पेश किए गए दलीलों पर मबनी है। कई सालों और मुख़्तलिफ़ किस्म के अस्क़ास (संपत्तियों) पर मुश्तमिल पेचीदा हिसाब के लिए किसी आलिम-ए-दीन से मशवरा करना बेहतर है।

References

Quran Surah At-Tawbah 9:34-35
Hadith Sahih Muslim 987a; Sahih al-Bukhari 1397; Sahih al-Bukhari 1454; Sahih Muslim 979a; Sahih al-Bukhari 1404
Fiqh Based on evidence from Sahih al-Bukhari and Sahih Muslim; general consensus of Ahl al-Hadith scholars (e.g., Ibn Baz, al-Uthaymin).