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Recipients (8 Categories) Jul 13, 2026

क्या मैं अपने माता-पिता या दादा-दादी को ज़कात दे सकता हूँ?

Question

क्या मैं अपनी ज़कात अपने ग़रीब माता-पिता, दादा-दादी या दूसरे बुज़ुर्गों को दे सकता हूँ जिनका नफ़क़ा (भरण-पोषण) मुझ पर वाजिब है?

Ruling (Fatwa)

छोटा जवाब: अपने माता-पिता, दादा-दादी, या किसी भी ऐसे बुज़ुर्ग को, जिनका नफ़क़ा (भरण-पोषण) शरई और क़ानूनी तौर पर आप पर वाजिब है, अपनी फ़र्ज़ ज़कात देना जायज़ नहीं है। इसकी वजह यह है कि ज़कात उन ज़रूरतमंदों को देने के लिए मुक़र्रर की गई है जो आपकी वाजिब कफ़ालत के दायरे से बाहर हों; जिसका नफ़क़ा आप पर वाजिब है उसे ज़कात देना सिर्फ़ आपके पहले से मौजूद फ़र्ज़ को पूरा करना है, और यह फ़ुक़रा (ग़रीबों) की तरफ़ माल की असल मुंतक़िली (हस्तांतरण) नहीं है जो शरीयत का मक़सद है। पेश किए गए दलाइल इस मसले को सीधे तौर पर बयान नहीं करते, लेकिन यह आम उसूल इस बात से लिया गया है कि ज़कात के मुस्तहिक़ीन की आठ अस्नाफ़ (जैसे फ़क़ीर, मिसकीन वग़ैरह) में वे लोग शामिल नहीं जिनका नफ़क़ा देने वाले पर वाजिब है। इसके अलावा, ऐसे रिश्तेदारों को नफ़ली सदक़ा देना बहुत मुस्तहब है, और हदीस के मुताबिक़ इसमें दुगना सवाब है, लेकिन फ़र्ज़ ज़कात के अहकाम अलग हैं। इस मौज़ू से सबसे क़रीबी दलाइल ये हैं: 1. सहीह बुख़ारी 1461: नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि रिश्तेदार को सदक़ा देने पर दुगना सवाब मिलता है – सदक़े का सवाब और सिला-रहमी (रिश्तेदारी निभाने) का सवाब। यह नफ़ली सदक़े पर लागू होता है, फ़र्ज़ ज़कात पर नहीं, और इससे साबित होता है कि रिश्तेदार सदक़े के मुस्तहिक़ हैं लेकिन ज़कात के लिए ख़ास पाबंदियाँ हैं। 2. सहीह मुस्लिम 1044: नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन अस्नाफ़ को बयान किया जिनके लिए सवाल करना या ज़कात लेना जायज़ है, जिनमें इंसान के अपने ज़ेर-ए-कफ़ालत (आश्रित) लोग शामिल नहीं, जिससे मालूम होता है कि ज़कात उन्हें नहीं दी जा सकती जिनका नफ़क़ा आप पर वाजिब है। पस इस उसूल की बुनियाद पर कि आप अपना वाजिब फ़र्ज़ ज़कात से पूरा नहीं कर सकते, दुरुस्त मौक़िफ़ (राय) यह है कि उन माता-पिता या बुज़ुर्गों को ज़कात देना जिनका नफ़क़ा आप पर वाजिब है, सही नहीं है। आप उन्हें नफ़ली सदक़ा या किसी और तरह की मदद दे सकते हैं। अगर मामला पेचीदा हो (जैसे शदीद ज़रूरत या ग़ैर-मामूली हालात) तो किसी माहिर आलिम से मशवरा करें।

References

Hadith Sahih al-Bukhari 1461; Sahih Muslim 1044
Fiqh Based on general principles from the Qur'an and Sunnah; the majority of scholars including Ibn Baz, al-Uthaymin, and the Permanent Committee hold this view. The provided passages do not directly addre