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Business & Trade
Jul 13, 2026
कारोबारी वाजिब-उल-वसूल और वाजिब-उल-अदा रक़में और ज़कात
Question
गाहकों की तरफ़ मेरी वाजिब-उल-वसूल रक़में और सप्लायर्स के वे बिल जो मुझ पर वाजिब-उल-अदा हैं, मेरी कारोबारी ज़कात पर कैसे असर डालते हैं?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: गाहकों की वे रक़में जो वसूल के क़ाबिल हों (किसी मालदार, इक़रार करने वाले क़र्ज़दार की तरफ़) 'मज़बूत क़र्ज़' शुमार होती हैं और ज़कात के हिसाब के वक़्त इन्हें हर साल अपनी नक़दी और माल-ए-तिजारत में शामिल करना ज़रूरी है। मशकूक या डूबी हुई वसूलियाँ 'कमज़ोर क़र्ज़' हैं और इनका शुमार सिर्फ़ हक़ीक़ी वसूली के वक़्त होता है। सप्लायर्स के बिल और दीगर कारोबारी वाजिब-उल-अदा रक़में ज़कात के हिसाब से पहले आपके कुल क़ाबिल-ए-ज़कात माल (नक़दी + माल-ए-तिजारत + मज़बूत वसूलियाँ) से मनहा (घटा) की जाती हैं। यही राजेह क़ौल है।
तफ़्सील: कारोबारी माल की ज़कात आपके ख़ालिस माल पर आयद होती है—जो आपकी मिल्कियत में है उसमें से जो आप पर वाजिब-उल-अदा है वह निकालकर। वसूलियों के बारे में: अगर गाहक अदायगी की इस्तिताअत रखता हो और क़र्ज़ का इक़रार करता हो, तो यह आपके माल का हिस्सा समझी जाएगी और आप इसे हर साल शामिल करेंगे। अगर क़र्ज़ डूब चुका हो (ख़राब या ग़ैर-यक़ीनी), तो आप उस वक़्त तक इंतज़ार करेंगे जब तक रक़म हक़ीक़तन वसूल न हो जाए, फिर अगर रक़म निसाब से ज़्यादा हो तो उस साल और गुज़श्ता सालों की ज़कात अदा करेंगे। वाजिब-उल-अदा रक़में के बारे में: तमाम जायज़ कारोबारी क़र्ज़े (मसलन सप्लायर के बिल, क़र्ज़े) आपके कुल माल (नक़दी, मौजूदा फ़रोख़्त क़ीमत पर लगाया गया माल-ए-तिजारत, और मज़बूत वसूलियाँ) से मनहा किए जाते हैं, फिर ज़कात की शरह (माल-ए-तिजारत और नक़दी पर 2.5%) लागू की जाती है।
दलाइल:
1. शैख़ इब्न उसैमीन और मुस्तक़िल कमेटी (लजना दाइमा) के फ़तावा: मालदार और इक़रार करने वाले गाहक की तरफ़ कारोबारी वसूलियाँ 'मज़बूत क़र्ज़' हैं—ज़कात के लिए हर साल माल-ए-तिजारत और नक़दी में शामिल की जाती हैं। डूबी हुई/मशकूक वसूलियाँ 'कमज़ोर क़र्ज़' हैं—वसूली के वक़्त शुमार होती हैं। कारोबारी वाजिब-उल-अदा रक़में (सप्लायर के बिल) के बारे में राजेह क़ौल यह है कि वे क़ाबिल-ए-ज़कात माल से मनहा की जाती हैं। (P1)
2. सूरह अल-बक़रह 2:267 पाकीज़ा कमाई से ख़र्च करने का हुक्म देती है, जो इस बात की तरफ़ इशारा है कि तमाम माल (बशुमूल क़ाबिल-ए-वसूल रक़में) ज़कात के ताबेअ है। (P2)
3. माल-ए-तिजारत की क़ीमत लगाने के बारे में शैख़ इब्न उसैमीन के फ़तावा: माल-ए-तिजारत की क़ीमत ज़कात के दिन की मुनासिब फ़रोख़्त क़ीमत पर लगाई जाती है, और यही उसूल माल-ए-तिजारत को ज़कात की बुनियाद में शामिल करते वक़्त लागू होता है। (P4)
अगर आपके कारोबार की सूरतेहाल पेचीदा हो (मसलन मुतअद्दिद क़र्ज़े, मुख़्तलिफ़ अक़्साम की मख़लूत वसूलियाँ) तो बराह-ए-करम किसी बा-इल्म आलिम या क़ाबिल-ए-एतमाद इस्लामी माली उमूर के माहिर से मशवरा करें।
References
Quran
Surah Al-Baqarah 2:267
Fiqh
Ibn Uthaymin; Permanent Committee