Question
मैं एक फ़्लैट किराए पर देता हूँ। क्या ज़कात फ़्लैट की क़ीमत पर होगी या किराए पर?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: फ़्लैट की क़ीमत पर नहीं — ज़कात किराए से जमा हुई रक़म पर वाजिब होती है। आपके ज़कात के दिन किराए की जो बचत (आपकी दूसरी नक़दी के साथ मिलाकर) निसाब से ऊपर हो, उस पर 2.5% ज़कात अदा की जाएगी।
तफ़सील: किराए पर दी गई जायदाद एक आमदनी देने वाला मुस्तक़िल असासा है, जैसे कारीगर के औज़ार या किराए पर चलने वाली गाड़ी; ख़ुद असासा ज़कात से मुस्तसना है जबकि उसकी आमदनी पर नक़दी के अहकाम लागू होते हैं। पेशगी किराया वुसूल होते ही नक़दी शुमार होता है। ख़र्चे (मरम्मत, टैक्स) निकालने के बाद जो बाक़ी बचे वही हिसाब में आता है। अगर आप कभी इस जायदाद को दोबारा बेचने की तिजारत की नीयत से रख लें, तो उसी दिन से वह माल-ए-तिजारत बन जाती है जिस पर बाज़ारी क़ीमत के हिसाब से ज़कात वाजिब होगी।
दलाइल: सहीह बुख़ारी 1464 (इस्तेमाली असासों की छूट); सहीह बुख़ारी 1454 (नक़दी की ज़कात); इब्ने माजा 1792 (हौल); नीज़ शैख़ इब्ने बाज़, शैख़ इब्ने उसैमीन और अल-लजना अद-दाइमा (मुस्तक़िल फ़तवा कमेटी) के फ़तावा कि किराए की जायदाद पर ज़कात सिर्फ़ उसके जमा शुदा किराए पर है।
अमल का तरीक़ा: सबसे आसान तरीक़ा — अपने सालाना ज़कात के दिन बैंक और नक़दी में जो कुछ हो, किराए समेत, सब एक साथ शुमार करें; हर महीने के किराए का अलग हौल गिनने की ज़रूरत नहीं।
पेचीदा इनफ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम-ए-दीन से रुजूअ करें।
References
Quran
Quran 9:103
Hadith
Bukhari 1464, 1454; Ibn Majah 1792
Fiqh
Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee