Question
हमारी ख़ानदानी ज़मीन का एक हिस्सा मस्जिद और मदरसे के लिए वक़्फ़ है; एक वक़्फ़ दुकान का किराया मदरसे को जाता है। क्या वक़्फ़ के माल पर ज़कात वाजिब है?
Ruling (Fatwa)
मुख़्तसर जवाब: जो जायदाद आम या दीनी मक़ासिद (मस्जिद, मदरसा, फ़ुक़रा) के लिए वक़्फ़ कर दी जाए — और उसकी आमदनी भी — उस पर ज़कात नहीं: वक़्फ़ होते ही वह ज़ाती मिल्कियत से निकलकर अल्लाह के लिए महबूस हो जाती है, जबकि ज़कात की शर्त ही किसी मुतअय्यन मालिक की मुकम्मल मिल्कियत है। अलबत्ता मुतअय्यन अश्ख़ास पर वक़्फ़ (मसलन "आमदनी मेरी औलाद के लिए") में मुस्तहिक़ीन जो आमदनी अमलन वसूल करें वह उनका अपना माल है — नक़दी के अहकाम के मुताबिक़ निसाब और हौल के एतबार से उस पर ज़कात वाजिब है।
तफ़सील: इस बाब की अस्ल हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़ैबर की ज़मीन का वाक़िआ है: नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: "अस्ल को रोक लो और उसका फल सदक़ा कर दो" — अस्ल जायदाद न बेची जाती है, न हिबा की जाती है, न विरासत में मुंतक़िल होती है। मुतवल्ली पर लाज़िम है कि आमदनी सिर्फ़ वाक़िफ़ के मुक़र्रर करदा मसारिफ़ पर ख़र्च करे — ख़ुद खा जाना अमानत में ख़यानत है। तंबीह: वक़्फ़ का एलान करके अमलन अपने क़ब्ज़े में रखने से न वक़्फ़ नाफ़िज़ होता है और न ज़कात की ज़िम्मेदारी से छुटकारा मिलता है; दस्तावेज़ात मुकम्मल करके इंतज़ाम हवाले कर दें।
दलाइल: सहीह बुख़ारी 2737 और सहीह मुस्लिम 1632 (हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का वक़्फ़); क़ुरआन 3:92; सहीह मुस्लिम 1631 (सदक़ा-ए-जारिया); जुमहूर उलमा और अल-लजना अद-दाइमा।
पेचीदा इनफ़िरादी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करें।
References
Quran
Quran 3:92
Hadith
Bukhari 2737; Muslim 1632, 1631
Fiqh
majority; Permanent Committee on waqf