Fatwa Library

The SGT Fatwa Library brings together verified Islamic rulings on Zakat for modern assets — cryptocurrency, stocks and shares, pension and GPF funds, real estate, and debts and loans. Each fatwa cites its Quran, Hadith, and scholarly references so you can apply the ruling with confidence, and every entry is available in six languages — বাংলা, English, العربية, اردو, Bahasa Indonesia and हिन्दी. Use the language buttons above and the filters below, then open any entry to read the full ruling and the evidence behind it.

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फ़ुक़रा (ग़रीब) और मसाकीन (मोहताज)

ज़कात के लिए फ़क़ीर या मिसकीन कौन गिना जाता है, और मैं कैसे जानूँ कि कोई वाक़ई हक़दार है?

मुख़्तसर जवाब: फ़ुक़रा और मसाकीन ज़कात के आठ मसारिफ़ (मदों) में से पहले दो हैं, जिनका ज़िक्र सूरह अत-तौबा 9:60 में है। फ़क़ीर वे हैं जिनके पास अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए कोई माल या आमदनी नहीं, जबकि मसाकीन वे हैं जिनके…
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Quran: Surah At-Tawbah 9:60• Hadith: Sahih al-Bukhari 1468; Sahih Muslim 983; Sahih Muslim 1000a; Sahih al-Bukhari 1466; Sahih al-Bukhari 1458; Sahih al-Bukhari 1395; Sahih al-Bukhari 1445• Fiqh: Qur'an (Surah At-Tawbah 9:60) and Sahih al-Bukhari / Sahih Muslim; interpretation based on the texts
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क्या मैं अपने माता-पिता या दादा-दादी को ज़कात दे सकता हूँ?

क्या मैं अपनी ज़कात अपने ग़रीब माता-पिता, दादा-दादी या दूसरे बुज़ुर्गों को दे सकता हूँ जिनका नफ़क़ा (भरण-पोषण) मुझ पर वाजिब है?

छोटा जवाब: अपने माता-पिता, दादा-दादी, या किसी भी ऐसे बुज़ुर्ग को, जिनका नफ़क़ा (भरण-पोषण) शरई और क़ानूनी तौर पर आप पर वाजिब है, अपनी फ़र्ज़ ज़कात देना जायज़ नहीं है। इसकी वजह यह है कि ज़कात उन ज़रूरतमंदों को देने के लिए मुक़र्रर की ग…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1461; Sahih Muslim 1044• Fiqh: Based on general principles from the Qur'an and Sunnah; the majority of scholars including Ibn Baz, al-Uthaymin, and the Permanent Committee hold this view. The provided passages do not directly addre
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ग़ैर-मुस्लिमों के लिए ज़कात

क्या फ़र्ज़ ज़कात ग़ैर-मुस्लिमों को दी जा सकती है, और नफ़ली सदक़े का क्या हुक्म है?

मुख़्तसर जवाब: फ़र्ज़ ज़कात (ज़कात-उल-माल और सदक़ातुल फ़ित्र) ग़ैर-मुस्लिमों को नहीं दी जा सकती। नफ़ली सदक़ा ग़ैर-मुस्लिमों को दिया जा सकता है। तफ़सील: पेश किए गए दलाइल से मालूम होता है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1395; Sahih al-Bukhari 1496; Sahih al-Bukhari 1458; Sahih Muslim 1022• Fiqh: Based on evidence from Sahih al-Bukhari and Sahih Muslim; position of Ahl al-Hadith scholars (e.g., Ibn Baz, al-Uthaymin, Permanent Committee)
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मस्जिद और मदरसों को ज़कात देना

क्या ज़कात का पैसा किसी मस्जिद के निर्माण या मदरसे और उसके तालिब-ए-इल्म (छात्रों) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है?

संक्षिप्त जवाब: दिए गए दलाइल के आधार पर, ज़कात का पैसा किसी मस्जिद के निर्माण या किसी मदरसे और उसके तालिब-ए-इल्म (छात्रों) के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये क़ुरआन और सुन्नत में तय की गई ज़कात के मुस्तहिक़ीन की ख़ास श्रेणिय…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1404; Sahih al-Bukhari 1403; Sahih al-Bukhari 1468; Sahih al-Bukhari 1451; Sahih al-Bukhari 1454; Sahih al-Bukhari 1400• Fiqh: Based on the provided evidence, the position of the Permanent Committee for Islamic Research and Ifta (Saudi Arabia) and major Ahle Hadith scholars such as Ibn Baz and al-Uthaymin is that zakat must b
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जिस शख़्स को ज़ाहिरन मुस्तहिक़ समझकर ज़कात दी गई और बाद में वह ग़ैर-मुस्तहिक़ साबित हुआ, उसका हुक्म

मुझे बाद में मालूम हुआ कि जिस शख़्स को मैंने ज़कात दी थी वह मुस्तहिक़ नहीं था — तो क्या मुझे दोबारा ज़कात देनी होगी?

मुख़्तसर जवाब: अगर आपने ज़कात ऐसे शख़्स को दी जिसे आप सच्चे दिल से मुस्तहिक़ समझते थे (ज़ाहिरी फ़क़्र, क़र्ज़ वग़ैरा की बिना पर) और बाद में मालूम हुआ कि वह दरअसल मुस्तहिक़ नहीं था, तो आपकी ज़कात अल्लाह के यहाँ क़बूल है और आप पर दोबारा अदा क…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1421; Sahih Muslim 1022• Fiqh: Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee
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सरकारी टैक्स बनाम ज़कात: क्या ये एक-दूसरे की जगह ले सकते हैं?

मैं पहले से ही भारी इनकम टैक्स देता हूँ — क्या वह मेरी ज़कात में गिना जा सकता है या उसकी जगह ले सकता है?

संक्षिप्त जवाब: नहीं, सरकारी टैक्स आपकी फ़र्ज़ ज़कात में नहीं गिना जा सकता और न ही उसकी जगह ले सकता है। ज़कात एक अलग इस्लामी फ़र्ज़ है जिसके तय अहकाम हैं, जबकि टैक्स एक शहरी ज़िम्मेदारी है। ये दोनों अलग-अलग हैं और एक-दूसरे का बदल नहीं…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1454; Sahih al-Bukhari 1468; Sahih Muslim 987a; Sahih Muslim 988a• Fiqh: Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee for Islamic Research and Ifta
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ज़कात वाजिब होने के बाद माल का खो जाना या चोरी हो जाना

मुझ पर ज़कात वाजिब हो गई, फिर अदा करने से पहले माल खो गया या चोरी हो गया — क्या अब भी ज़कात देना वाजिब है?

मुख़्तसर जवाब: अगर ज़कात वाजिब होने के बाद और अदा करने से पहले माल खो जाए या चोरी हो जाए, तो अहले इल्म का आम क़ौल — इस उसूल पर मबनी कि ज़कात ख़ुद माल के साथ जुड़ा हुआ एक हक़ है — यह है कि ज़कात अब वाजिब नहीं रहती, क्योंकि वुजूब का…
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Quran: Surah At-Tawbah 9:34-35• Hadith: Sahih al-Bukhari 1403; Sahih al-Bukhari 1405; Sahih al-Bukhari 1395• Fiqh: Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee
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ज़कात की नीयत

क्या ज़कात के लिए कोई ख़ास नीयत ज़रूरी है, और यह कब करनी चाहिए?

मुख़्तसर जवाब: पेश किए गए दलाइल में ज़कात के लिए किसी ख़ास ज़बानी या ज़ाहिरी नीयत की शर्त का साफ़ ज़िक्र नहीं है। लेकिन आम इस्लामी उसूलों की बुनियाद पर और इस वजह से कि ज़कात एक इबादत है, दिल की नीयत तमाम इबादात के लिए असलन ज़रूरी है…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1454; Sahih al-Bukhari 1404; Sahih al-Bukhari 1395; Sahih al-Bukhari 1403; Sahih al-Bukhari 1504; Sahih al-Bukhari 1496• Fiqh: General Ahle Hadith position based on the obligatory nature of zakat and the principle of intention in worship
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ज़कात की अदायगी में देरी: हुक्म और नतीजे

ज़कात फ़र्ज़ हो जाने के बाद उसकी अदायगी में देरी करना क्या गुनाह है? और अगर कोई बरसों तक भूल जाए तो क्या करे?

मुख़्तसर जवाब: ज़कात फ़र्ज़ हो जाने के बाद किसी शरई उज़्र के बग़ैर जान-बूझकर देरी करना गुनाह है, क्योंकि सहीह हदीसों में इस पर सख़्त वईद (चेतावनी) आई है। अगर कोई शख़्स बरसों तक ज़कात अदा करना भूल जाए तो उस पर लाज़िम है कि तौबा करे, उन …
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Hadith: Sahih Muslim 987a; Sahih al-Bukhari 1468; Sahih al-Bukhari 1503• Fiqh: Based on Sahih al-Bukhari and Sahih Muslim; evidence from the Permanent Committee for Islamic Research and Ifta and scholars such as Ibn Baz and al-Uthaymin.
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मिले-जुले माल (नक़दी, सोना, कारोबार, वसूली-योग्य रक़म) पर ज़कात की गणना

मैं अपनी तय तारीख़ पर नक़दी, सोना, कारोबार और वसूली-योग्य रक़म को एक ही ज़कात की गणना में कैसे जोड़ूँ?

संक्षिप्त उत्तर: अपनी चुनी हुई ज़कात की तारीख़ पर तमाम ज़कात-योग्य माल (नक़दी, सोना, कारोबारी माल और भरोसेमंद वसूली-योग्य रक़म) की बाज़ार क़ीमत जमा करें। फ़ौरन अदा करने वाली देनदारियाँ घटा दें। अगर शुद्ध कुल रक़म निसाब (85 ग्राम सोने य…
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Quran: Surah At-Tawbah 9:34-35; Surah At-Tawbah 9:71• Hadith: Sahih al-Bukhari 1454; Sahih al-Bukhari 1404; Sahih al-Bukhari 1403; Sahih Muslim 987a• Fiqh: Ibn Baz; al-Uthaymin; Permanent Committee
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पिछले सालों की छूटी हुई ज़कात अदा करना

मैंने कई पिछले सालों की ज़कात अदा नहीं की — मैं छूटे हुए सालों की ज़कात कैसे हिसाब करूँ और अदा करूँ?

संक्षिप्त जवाब: पेश किए गए दलील ज़कात के वुजूब और उसे छोड़ने पर सख़्त सज़ा को साबित करते हैं (सूरह अत-तौबा 9:34-35, सहीह मुस्लिम 987a), लेकिन इनमें यह साफ़ हिदायत नहीं कि पिछले सालों की ज़कात कैसे हिसाब या अदा की जाए। इसलिए नीचे …
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Quran: Surah At-Tawbah 9:34-35• Hadith: Sahih Muslim 987a; Sahih al-Bukhari 1397; Sahih al-Bukhari 1454; Sahih Muslim 979a; Sahih al-Bukhari 1404• Fiqh: Based on evidence from Sahih al-Bukhari and Sahih Muslim; general consensus of Ahl al-Hadith scholars (e.g., Ibn Baz, al-Uthaymin).
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अपनी ज़कात बाँटने के लिए किसी को वकील बनाना

क्या मैं अपनी ज़कात अपनी तरफ़ से बाँटने के लिए किसी रिश्तेदार या कमेटी को इख़्तियार दे सकता हूँ?

संक्षिप्त जवाब: जी हाँ, अपनी ज़कात अपनी तरफ़ से बाँटने के लिए किसी अमानतदार रिश्तेदार या कमेटी को वकील बनाना जायज़ है। यह नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन के साबितशुदा अमल पर मबनी है, जो ज़कात की वसूली और तक़्…
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Hadith: Sahih al-Bukhari 1468; Sahih al-Bukhari 1454• Fiqh: Sahih al-Bukhari; Permanent Committee for Islamic Research and Ifta; Ibn Baz; al-Uthaymin
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